नई दिल्ली : आज भारत रत्न और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि के अवसर पर पूरा देश उन्हें श्रद्धा और सम्मान के साथ याद कर रहा है। वाजपेयी जी न केवल भारतीय राजनीति के एक प्रमुख स्तंभ रहे, बल्कि वे एक संवेदनशील कवि, तेजस्वी पत्रकार और समर्पित समाजसेवी भी थे। उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा, लेकिन हर चुनौती के सामने वे ‘अटल’ खड़े रहे।
25 दिसंबर 1924 को मध्यप्रदेश के ग्वालियर में जन्मे अटल जी ने ग्वालियर और कानपुर से शिक्षा ग्रहण की। छात्र जीवन से ही उनका झुकाव राष्ट्रवादी विचारधारा और साहित्य की ओर था। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और बाद में पत्रकारिता में सक्रिय रहते हुए समाज की समस्याओं को अपनी लेखनी से उजागर करते रहे।
राजनीतिक सफर की शुरुआत उन्होंने 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ भारतीय जनसंघ की स्थापना में भाग लेकर की। 1957 में पहली बार बलरामपुर से लोकसभा सांसद चुने गए। 1977 में जनता पार्टी सरकार में विदेश मंत्री बने और संयुक्त राष्ट्र महासभा को हिंदी में संबोधित कर ऐतिहासिक कार्य किया।
प्रधानमंत्री के रूप में वे तीन बार देश का नेतृत्व कर चुके हैं—1996 में 13 दिन की सरकार, फिर 1998-99 में 13 महीने और अंततः 1999 से 2004 तक एक स्थिर सरकार चलाई। उनके कार्यकाल को कई ऐतिहासिक निर्णयों के लिए याद किया जाता है—1998 का पोखरण परमाणु परीक्षण, 1999 का कारगिल युद्ध में नेतृत्व, लाहौर बस सेवा के जरिए शांति की पहल, स्वर्णिम चतुर्भुज योजना से देश की सड़कों का जाल बिछाना और प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना से गाँवों को जोड़ना।
वाजपेयी जी का योगदान सिर्फ राजनीतिक नहीं था, बल्कि उनकी कविताएँ भी आज करोड़ों दिलों को प्रेरणा देती हैं—”हार नहीं मानूँगा”, “कदम मिलाकर चलना होगा” जैसी रचनाएँ उनके जुझारूपन की मिसाल हैं। वे लोकतंत्र के सच्चे संरक्षक थे, जिनका सम्मान उनके विरोधी भी करते थे।

