रांची : देशभर में 79वां स्वतंत्रता दिवस धूमधाम से मनाया जा रहा है, और इस अवसर पर झारखंड की राजधानी रांची एक खास पहचान के साथ उभरकर सामने आती है। यह शहर न सिर्फ ऐतिहासिक दृष्टि से समृद्ध है, बल्कि आजादी के आंदोलन में इसकी सक्रिय भागीदारी को दर्शाने वाले कई स्थल आज भी मौजूद हैं, जो स्वतंत्रता संग्राम की यादें ताजा कर देते हैं।
रांची का मोरहाबादी मैदान ऐसा ही एक स्थल है, जहां 4 अगस्त 1925 को महात्मा गांधी ने जनसभा को संबोधित किया था। उन्होंने खादी, शराबबंदी और छुआछूत उन्मूलन पर जोर दिया, और आदिवासी समुदाय से अपनी जमीन और अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होने का आह्वान किया। 1934 में हरिजन आंदोलन के दौरान गांधीजी ने हरिजन बस्तियों का दौरा किया। उनके अलावा, जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस ने भी रांची आकर जनता और युवाओं में राष्ट्रीय चेतना का संचार किया।
कोकर स्थित ‘बापू कुटीर’ एक और ऐतिहासिक धरोहर है, जहां 1940 में रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन में शामिल होने आए महात्मा गांधी ने विश्राम किया था। यह स्थान आज भी सुरक्षित है और जायसवाल परिवार इसे स्मारक रूप में सहेजे हुए है।
रांची का पहाड़ी मंदिर, जिसे पहले ‘टिरीबुरू’ और ब्रिटिश काल में ‘फांसी टुंगरी’ कहा जाता था, भी आजादी के इतिहास में खास स्थान रखता है। 15 अगस्त 1947 की सुबह इसी मंदिर पर पहली बार स्वतंत्र भारत का तिरंगा फहराया गया था, जो आज भी गर्व का प्रतीक है।
बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार (पूर्व सेंट्रल जेल) भी आजादी की लड़ाई का अहम गवाह है। 1899-1900 के ‘उलगुलान’ आंदोलन के दौरान अंग्रेजों ने यहां कई क्रांतिकारियों को बंद किया था। बिरसा मुंडा को भी इसी जेल में रखा गया था, जहां 9 जून 1900 को उनकी मृत्यु हो गई। यह जेल अब एक संग्रहालय और पार्क के रूप में संरक्षित है।
रांची के जिला स्कूल परिसर में भी इतिहास की एक अमिट छाप है। यहीं 16 अप्रैल 1858 को स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव को अंग्रेजों ने फांसी दी थी। यह स्थान झारखंड के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बलिदान की गवाही आज भी देता है।
इन ऐतिहासिक स्थलों के माध्यम से रांची आज भी आजादी के संघर्ष की गाथा जीवंत रूप में सुना रहा है, जो हर भारतीय को गर्व और प्रेरणा से भर देता है।

